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वन पर्व
अध्याय १
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वैशम्पाय़न उवाच
नेय़मस्ति मही कृत्स्ना यत्र दुर्योधनो नृपः |  १५   क
साधु गच्छामहे सर्वे यत्र गच्छन्ति पाण्डवाः ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति