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शल्य पर्व
अध्याय १७
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सञ्जय़ उवाच
ते मुहूर्ताद्रणे वीरा हस्ताहस्तं विशां पते |  २८   क
निहताः प्रत्यदृश्यन्त मद्रराजपदानुगाः ||  २८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति