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शल्य पर्व
अध्याय १७
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सञ्जय़ उवाच
रथैर्भग्नैर्युगाक्षैश्च निहतैश्च महारथैः |  ३१   क
अश्वैर्निपतितैश्चैव सञ्छन्नाभूद्वसुन्धरा ||  ३१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति