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शल्य पर्व
अध्याय १७
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सञ्जय़ उवाच
अभ्यवर्तन्त वेगेन जय़गृध्राः प्रहारिणः |  ३६   क
वाणशव्दरवान्कृत्वा विमिश्राञ्शङ्खनिस्वनैः ||  ३६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति