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उद्योग पर्व
अध्याय २७
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सञ्जय़ उवाच
धर्मे नित्या पाण्डव ते विचेष्टा; लोके श्रुता दृश्यते चापि पार्थ |  १   क
महास्रावं जीवितं चाप्यनित्यं; सम्पश्य त्वं पाण्डव मा विनीनशः ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति