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शल्य पर्व
अध्याय १७
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सञ्जय़ उवाच
ते तु शूरा महाराज कृतचित्ताः स्म योधने |  ४   क
धनुःशव्दं महत्कृत्वा सहाय़ुध्यन्त पाण्डवैः ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति