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अनुशासन पर्व
अध्याय १०९
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अङ्गिरा उवाच
आर्तो वा व्याधितो वापि गच्छेदनशनं तु यः |  ५३   क
शतं वर्षसहस्राणां मोदते दिवि स प्रभो |  ५३   ख
काञ्चीनूपुरशव्देन सुप्तश्चैव प्रवोध्यते ||  ५३   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति