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शान्ति पर्व
अध्याय १७०
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भीष्म उवाच
उत्पन्नमिह लोके वै जन्मप्रभृति मानवम् |  ४   क
विविधान्युपवर्तन्ते दुःखानि च सुखानि च ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति