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शान्ति पर्व
अध्याय १७०
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भीष्म उवाच
तय़ोरेकतरे मार्गे यद्येनमभिसंनय़ेत् |  ५   क
न सुखं प्राप्य संहृष्येन्न दुःखं प्राप्य सञ्ज्वरेत् ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति