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वन पर्व
अध्याय १७०
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मातलिरु उवाच
त एते मुदिता नित्यमवध्याः सर्वदैवतैः |  १२   क
निवसन्त्यत्र राजेन्द्र गतोद्वेगा निरुत्सुकाः |  १२   ख
मानुषो मृत्युरेतेषां निर्दिष्टो व्रह्मणा पुरा ||  १२   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति