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वन पर्व
अध्याय १७०
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अर्जुन उवाच
उवाह मां ततः शीघ्रं हिरण्यपुरमन्तिकात् |  १५   क
रथेन तेन दिव्येन हरिय़ुक्तेन मातलिः ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति