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वन पर्व
अध्याय १७०
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अर्जुन उवाच
ते मामालक्ष्य दैतेय़ा विचित्राभरणाम्वराः |  १६   क
समुत्पेतुर्महावेगा रथानास्थाय़ दंशिताः ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति