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वन पर्व
अध्याय २४८
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वैशम्पाय़न उवाच
अप्यहं कृतकामः स्यामिमां प्राप्य वरस्त्रिय़म् |  १६   क
गच्छ जानीहि को न्वस्या नाथ इत्येव कोटिक ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति