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वन पर्व
अध्याय १७०
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अर्जुन उवाच
द्रुमै रत्नमय़ैश्चैत्रैर्भास्वरैश्च पतत्रिभिः |  २   क
पौलोमैः कालकेय़ैश्च नित्यहृष्टैरधिष्ठितम् ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति