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वन पर्व
अध्याय १७०
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अर्जुन उवाच
तेषामहं विमूढानामन्योन्यमभिधावताम् |  २०   क
शिरांसि विशिखैर्दीप्तैर्व्यहरं शतसङ्घशः ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति