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वन पर्व
अध्याय १७०
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अर्जुन उवाच
तत्पुरं खचरं दिव्यं कामगं दिव्यवर्चसम् |  २३   क
दैतेय़ैर्वरदानेन धार्यते स्म यथासुखम् ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति