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वन पर्व
अध्याय १७०
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अर्जुन उवाच
अन्तर्भूमौ निपतितं पुनरूर्ध्वं प्रतिष्ठते |  २४   क
पुनस्तिर्यक्प्रय़ात्याशु पुनरप्सु निमज्जति ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति