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वन पर्व
अध्याय १७०
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अर्जुन उवाच
विक्षतं चाय़सैर्वाणैर्मत्प्रय़ुक्तैरजिह्मगैः |  २७   क
महीमभ्यपतद्राजन्प्रभग्नं पुरमासुरम् ||  २७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति