वन पर्व  अध्याय १७०

अर्जुन उवाच

ततो मातलिरप्याशु पुरस्तान्निपतन्निव |  २९   क
महीमवातरत्क्षिप्रं रथेनादित्यवर्चसा ||  २९   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति