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वन पर्व
अध्याय २६५
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मार्कण्डेय़ उवाच
दिव्याम्वरधरः श्रीमान्सुमृष्टमणिकुण्डलः |  ४   क
विचित्रमाल्यमुकुटो वसन्त इव मूर्तिमान् ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति