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वन पर्व
अध्याय १७०
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अर्जुन उवाच
गोपुराट्टालकोपेतं चतुर्द्वारं दुरासदम् |  ३   क
सर्वरत्नमय़ं दिव्यमद्भुतोपमदर्शनम् |  ३   ख
द्रुमैः पुष्पफलोपेतैर्दिव्यरत्नमय़ैर्वृतम् ||  ३   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति