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वन पर्व
अध्याय १७०
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अर्जुन उवाच
नेमे शक्या मानुषेण युद्धेनेति प्रचिन्त्य वै |  ३२   क
ततोऽहमानुपूर्व्येण सर्वाण्यस्त्राण्ययोजय़म् ||  ३२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति