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वन पर्व
अध्याय १७०
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अर्जुन उवाच
रथमार्गान्विचित्रांस्ते विचरन्तो महारथाः |  ३४   क
प्रत्यदृश्यन्त सङ्ग्रामे शतशोऽथ सहस्रशः ||  ३४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति