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वन पर्व
अध्याय १७०
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अर्जुन उवाच
विचित्रमुकुटापीडा विचित्रकवचध्वजाः |  ३५   क
विचित्राभरणाश्चैव नन्दय़न्तीव मे मनः ||  ३५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति