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वन पर्व
अध्याय १७०
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अर्जुन उवाच
अहं तु शरवर्षैस्तानस्त्रप्रमुदितै रणे |  ३६   क
नाशक्नुवं पीडय़ितुं ते तु मां पर्यपीडय़न् ||  ३६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति