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वन पर्व
अध्याय १७०
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अर्जुन उवाच
ततोऽहं देवदेवाय़ रुद्राय़ प्रणतो रणे |  ३८   क
स्वस्ति भूतेभ्य इत्युक्त्वा महास्त्रं समय़ोजय़म् |  ३८   ख
यत्तद्रौद्रमिति ख्यातं सर्वामित्रविनाशनम् ||  ३८   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति