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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ३५
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वासुदेव उवाच
तमेवंवादिनं पार्थ शिष्यं गुरुरुवाच ह |  ५   क
कथय़स्व प्रवक्ष्यामि यत्र ते संशय़ो द्विज ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति