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वन पर्व
अध्याय १७०
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अर्जुन उवाच
विभीस्ततस्तदस्त्रं तु घोरं रौद्रं सनातनम् |  ४०   क
दृष्ट्वा गाण्डीवसंय़ोगमानीय़ भरतर्षभ ||  ४०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति