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द्रोण पर्व
अध्याय १६६
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सञ्जय़ उवाच
न्याय़वृत्तो वधो यस्तु सङ्ग्रामे युध्यतो भवेत् |  २१   क
न स दुःखाय़ भवति तथा दृष्टो हि स द्विजः ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति