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शल्य पर्व
अध्याय २२
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सञ्जय़ उवाच
गच्छ त्वं द्रौपदेय़ाश्च शकुनिं सौवलं जहि |  ३४   क
रथानीकमहं रक्ष्ये पाञ्चालसहितोऽनघ ||  ३४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति