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वन पर्व
अध्याय १७०
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अर्जुन उवाच
त्रिषिरोभिश्चतुर्दंष्ट्रैश्चतुरास्यैश्चतुर्भुजैः |  ४८   क
अनेकरूपसंय़ुक्तैर्मांसमेदोवसाशिभिः |  ४८   ख
अभीक्ष्णं वध्यमानास्ते दानवा ये समागताः ||  ४८   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति