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वन पर्व
अध्याय १७०
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अर्जुन उवाच
तदहं प्रेक्ष्य दैत्यानां पुरमद्भुतदर्शनम् |  ५   क
अपृच्छं मातलिं राजन्किमिदं दृश्यतेति वै ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति