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वन पर्व
अध्याय १७०
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अर्जुन उवाच
तथा रौद्रास्त्रनिष्पिष्टान्दिव्याभरणभूषितान् |  ५१   क
निशाम्य परमं हर्षमगमद्देवसारथिः ||  ५१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति