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वन पर्व
अध्याय १७०
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अर्जुन उवाच
सुरासुरैरवध्यं हि पुरमेतत्खगं महत् |  ५४   क
त्वय़ा विमथितं वीर स्ववीर्यास्त्रतपोवलात् ||  ५४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति