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वन पर्व
अध्याय १७०
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अर्जुन उवाच
प्रकीर्णकेश्यो व्यथिताः कुरर्य इव दुःखिताः |  ५६   क
पेतुः पुत्रान्पितॄन्भ्रातॄञ्शोचमाना महीतले ||  ५६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति