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वन पर्व
अध्याय १७०
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अर्जुन उवाच
रुदन्त्यो दीनकण्ठ्यस्ता विनदन्त्यो हतेश्वराः |  ५७   क
उरांसि पाणिभिर्घ्नन्त्यः प्रस्रस्तस्रग्विभूषणाः ||  ५७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति