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वन पर्व
अध्याय १७०
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अर्जुन उवाच
तच्छोकय़ुक्तमश्रीकं दुःखदैन्यसमाहतम् |  ५८   क
न वभौ दानवपुरं हतत्विट्कं हतेश्वरम् ||  ५८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति