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वन पर्व
अध्याय १७०
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अर्जुन उवाच
हिरण्यपुरमारुज्य निहत्य च महासुरान् |  ६१   क
निवातकवचांश्चैव ततोऽहं शक्रमागमम् ||  ६१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति