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वन पर्व
अध्याय १७०
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अर्जुन उवाच
ततो मां देवराजो वै समाश्वास्य पुनः पुनः |  ६५   क
अव्रवीद्विवुधैः सार्धमिदं सुमधुरं वचः ||  ६५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति