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वन पर्व
अध्याय १७०
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अर्जुन उवाच
वसुधां चापि कौन्तेय़ त्वद्वाहुवलनिर्जिताम् |  ६९   क
पालय़िष्यति धर्मात्मा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ||  ६९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति