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वन पर्व
अध्याय १७०
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मातलिरु उवाच
रमणीय़ं पुरं चेदं खचरं सुकृतप्रभम् |  ८   क
सर्वरत्नैः समुदितं दुर्धर्षममरैरपि |  ८   ख
सय़क्षगन्धर्वगणैः पन्नगासुरराक्षसैः ||  ८   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति