सौप्तिक पर्व  अध्याय ४

कृप उवाच

सर्वोपाय़ैः सहाय़ास्ते प्रभाते वय़मेव हि |  १९   क
सत्यमेतन्महावाहो प्रव्रवीमि तवानघ ||  १९   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति