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वन पर्व
अध्याय १८६
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मार्कण्डेय़ उवाच
विपरीतास्तदा नार्यो वञ्चय़ित्वा रहः पतीन् |  ५५   क
व्युच्चरन्त्यपि दुःशीला दासैः पशुभिरेव च ||  ५५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति