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द्रोण पर्व
अध्याय १७०
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सञ्जय़ उवाच
ततः स कदनं चक्रे रिपूणां द्रोणनन्दनः |  १   क
युगान्ते सर्वभूतानां कालसृष्ट इवान्तकः ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति