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द्रोण पर्व
अध्याय १७०
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सञ्जय़ उवाच
ततो निर्मथ्यमानस्य सागरस्येव निस्वनः |  १४   क
अभवत्तस्य सैन्यस्य सुमहानद्भुतोपमः ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति