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द्रोण पर्व
अध्याय १७०
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सञ्जय़ उवाच
चतुर्दिशं विचित्राश्च शतघ्न्योऽथ हुताशदाः |  १९   क
चक्राणि च क्षुरान्तानि मण्डलानीव भास्वतः ||  १९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति