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द्रोण पर्व
अध्याय १७०
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सञ्जय़ उवाच
द्रवमाणं तु तत्सैन्यं दृष्ट्वा विगतचेतनम् |  २५   क
मध्यस्थतां च पार्थस्य धर्मपुत्रोऽव्रवीदिदम् ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति