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द्रोण पर्व
अध्याय १७०
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सञ्जय़ उवाच
वासुदेवोऽपि धर्मात्मा करिष्यत्यात्मनः क्षमम् |  २७   क
उपदेष्टुं समर्थोऽय़ं लोकस्य किमुतात्मनः ||  २७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति