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द्रोण पर्व
अध्याय १७०
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सञ्जय़ उवाच
जिघांसुर्धार्तराष्ट्रश्च श्रान्तेष्वश्वेषु फल्गुनम् |  ३३   क
कवचेन तथा युक्तो रक्षार्थं सैन्धवस्य च ||  ३३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति