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द्रोण पर्व
अध्याय १७०
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सञ्जय़ उवाच
येन व्रह्मास्त्रविदुषा पाञ्चालाः सत्यजिन्मुखाः |  ३४   क
कुर्वाणा मज्जय़े यत्नं समूला विनिपातिताः ||  ३४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति