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द्रोण पर्व
अध्याय १७०
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सञ्जय़ उवाच
ये त्वेतत्प्रतिय़ोत्स्यन्ति मनसापीह केचन |  ४२   क
निहनिष्यति तान्सर्वान्रसातलगतानपि ||  ४२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति